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हम भी ख़ुद को तबाह कर लेते love shayari ham bhi khud ko tabah kar lete

भीतर क्या क्या हो रहा ऐ दिल कुछ तो बोल
एक आँख रोए बहुत एक हँसे जी खोल


हर-चंद हर एक शय में तू है
पर तुझ सी कोई शय नहीं है


झुक कर सलाम करने में क्या हर्ज है मगर 
सर इतना मत झुकाओ कि दस्तार गिर पड़े 


करिए तो गिला किस से जैसी थी हमें ख़्वाहिश
अब वैसे ही ये अपने अरमान निकलते हैं


सिर्फ़ मौसम के बदलने ही पे मौक़ूफ़ नहीं
दर्द भी सूरत-ए-हालात बता देता है


देने वाले की मशिय्यत पे है सब कुछ मौक़ूफ़ 
माँगने वाले की हाजत नहीं देखी जाती


हर एक रुत नहीं भाती हमारी आँखों को
हमारा ख़्वाब भी मौसम सुहाना चाहता है


हम भी ख़ुद को तबाह कर लेते
तुम इधर भी निगाह कर लेते



ऐसे अनमोल न थे हम कि न बिकते लेकिन
दो क़दम चल न सके अपने ख़रीदार के साथ


रोज़ मौसम की शरारत झेलता कब तक ,
मैंने खुद में रच लिए कुछ ख़ुशनुमा मंज़र


मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मेरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है


जाने किस आलम में तू बिछड़ा कि है तेरे बग़ैर
आज तक हर नक़्श फ़रियादी मिरी तहरीर का

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